Archive for ઓક્ટોબર, 2017

जज़्बा

Posted in गज़ल, hindi with tags on ઓક્ટોબર 19, 2017 by Asal Amdavadi

गिरते – सँभलते ही सीखा था चलना
ना बदलेंगे गिर के सम्भलनेका जज़्बा!

बनते, बिगड़ते बनी है ये दुनिया
की बनने से पहले बिगड़ेगा क्या वोह?!|

गिरायेगा क्या वोह? पछाड़ेगा क्या वोह?
की गिर के पटक के बनें सख्त पथ्थर!

तराशा जो पथ्थर तो बनती है मूरत,
ना तोड़ें उसे तो तराशेगा क्या वोह?? |

मारेगा क्या वोह? मिटाएगा क्या वोह?
के मरनेसे मिटती नहीं है शहीदी !

शहीदों के खुनों से बनता है भारत
ना खौला अगर तो बहायेगा क्या वोह?|

हसते हँसाते रहें – ना-रहें हम
मगर तू ना करना जुदाई का एक ग़म;

मिलते बिछडते कटी जिंदगी है
कभी ना भूला, याद करने का जज़्बा!|

यह कुछ शब्द अपने वीर जवानों के नाम, जिनके सरहद पर डंटे रहने से हम सब चैन से सो सकते हैं|

हिंदी में लिखने का मेरा यह प्रथम प्रयास है, कुछ ग़लत लिखा गया है तो माफी चाहूंगा | आपकी समज और सहकार के लिए बहोत ही शुक्रिया|

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